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संपादकीय लेख : एक समान सिविल संहिता का राग फिर शुरू

अब जब धारा 370 और अयोध्या विवाद का मामला सुलझ गया है तो कुछ अति उत्साही तथाकथित राष्ट्रवादी लोग एक समान सिविल संहिता का राग अलापना शुरू कर दिए हैं। इन दिनों सोशल मीडिया में इस मुद्दे पर काफी चर्चा है। अतः यह लाजमी हो जाता है कि इस मुद्दे के सभी पहलुओं पर चर्चा हो, न कि एक पक्षीय।

एक समान सिविल संहिता की व्यवस्था मूल संविधान में ही किया जाना चाहिए था लेकिन पंडित नेहरू का मानना था कि अभी अभी साम्प्रदायिक आधार पर देश का विभाजन हुआ है और भारत के मुस्लिम भाई असहज महसूस कर रहे हैं, ऐसी स्थिति में यदि उनके व्यक्तिगत मामलों में कानूनी हस्तक्षेप किया जाएगा तो वे भारत में अपने भविष्य को लेकर सशंकित हो जाएंगे। लेकिन इसके बावजूद भी एक समान सिविल संहिता के प्रावधान को संविधान के भाग-4 में नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद-44 में जगह दिया गया। इसमें यह कहा गया कि राज्य देश के समस्त भाग में रहने वाले नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता के निर्माण का प्रयास करेगा अर्थात आने वाली सरकारों का यह कर्तव्य होगा कि वे एक समान सिविल संहिता को लागू करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाएंगी। परन्तु नीति निदेशक प्रावधान न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं है, यह सरकार की इच्छा पर निर्भर है कि उसे लागू करें या नहीं करे इसीलिए आज तक यह मामला पेंडिंग है।

संविधान निर्माण काल में ही डॉक्टर अंबेडकर एक समान सिविल संहिता को लागू करने की दिशा में कानून बनाने के पक्षधर थे लेकिन नेहरू जी चाहते थे कि पहले हिंदू समाज से जुड़े नियमों कानूनों में संशोधन किया जाए। महिलाओं को संपत्ति का अधिकार दिया जाए। एकल विवाह की व्यवस्था की जाए। महिलाओं को तलाक लेने का अधिकार दिया जाए। बच्चे को गोद लेने के लिए जातीय बंधन समाप्त किए जाए। लेकिन डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद का मानना था कि इतनी शीघ्रता से हजारों वर्ष पुरानी हिंदू परम्परा से छेड़छाड़ करना उचित नहीं और वैसे भी हम प्रत्यक्ष रूप से जनता के चुने हुए प्रतिनिधि नहीं हैं। इस विषय में आम चुनाव के बाद विचार होना चाहिए। उन्होंने इतना तक कहा कि यदि सरकार ऐसा कोई विधेयक पास करके मेरे पास अनुमति के लिए भेजती है तो मै सदन के पास पुनर्विचार के लिए वापस लौटा दूंगा। अतः ऐसा कोई बिल सदन में नहीं प्रस्तुत किया जा सका।

लेकिन संविधान लागू हो जाने के बाद प्रथम विधि मंत्री अम्बेडकर जी पुनः हिंदू कोड बिल तैयार किए। इस बिल को नेहरू जी का समर्थन प्राप्त था। लेकिन बाकी सदस्यों का प्रश्न था कि ऐसा सुधार केवल हिन्दू समाज में ही क्यों? यदि सुधार करना है तो सभी धर्मो के लिए एक समान सिविल संहिता का निर्माण किया जाए। क्या महिलाओं से जुड़ी हुई समस्याएं केवल हिन्दू समाज में ही हैं? इस पर नेहरू जी फिर वही राग दुहराए कि हमारा समाज एक समान सिविल संहिता के लिए तैयार नहीं है पहले हिंदू रिफॉर्म किया जाए जो शेष के लिए जमीन तैयार करने का काम करेगा अतः मुस्लिम समाज को इससे अलग रखा गया। इसीलिए इस विधेयक को हिन्दू कोड बिल का नाम दिया गया। हालांकि स्वामी करपात्री जी महाराज के नेतृत्व में हिन्दू समुदाय का भी व्यापक विरोध देखने को मिला। करपात्री जी महराज की खुली चुनौती नेहरू जी और अम्बेडकर जी को थी कि यदि हिन्दू कोड बिल का कोई भी प्रावधान शास्त्र मम्मत सिद्ध कर दें तो मै इस बिल को स्वीकार कर लूंगा।

नेहरू जी इलाहाबाद के फूलपुर संसदीय क्षेत्र से प्रथम आम चुनाव लड़ रहे थे जहाँ उनका मुकाबला एक सन्यासी प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी से था। ब्रह्मचारी जी केवल हिन्दू कोड बिल के मुद्दे पर ही मतों का ध्रुवीकरण करके चुनाव जीतना चाहते थे। मतदाताओं की हवा का रूख देखते हुए नेहरू जी बैकफुट पर हो गए और हिन्दू कोड बिल को वापस ले लिए और जनता में यह संदेश प्रसारित किए कि हिंदू कोड बिल में जन भावनाओं का सम्मान करते हुए संशोधन किया जाएगा उसके बाद ही सदन में प्रस्तुत किया जाएगा। नेहरू जी के इस वक्तव्य से अम्बेडकर ही इतने नाराज हो गए कि कैबिनेट से इस्तीफा दे दिए और निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव में उतरे। शायद जनता अम्बेडकर जी से नाराज थी जिसके कारण अम्बेडकर जी चुनाव हार गए लेकिन नेहरू जी और उनकी पार्टी की जीत हुई।

अब हिंदू कोड बिल को सदन में पास कराना नेहरू जी की अकेले की जिम्मेदारी थी। अतः उन्होंने हिन्दू कोड बिल को कई हिस्सो में तोड़कर अलग अलग बिल के रूप में पास करवाकर कानून का रूप दिए। इसके बाद महिलाओं को संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त हुआ। तलाक का अधिकार मिला। एकल विवाह की व्यवस्था की गई। किसी बच्चे को गोद लेने में जातीय बंधन समाप्त कर दिया गया। लेकिन हिंदू कोड बिल के व्यापक जन विरोध के अनुभव और उससे उपजे भय के कारण आगे की सरकारें एक समान सिविल संहिता को लागू करने की इच्छा शक्ति नहीं दिखा पा रही हैं। उनको पता है कि हिन्दू समाज से कहीं ज्यादा मुस्लिम समाज कंजरवेटिव हैं। वे अपने व्यक्तिगत कानूनों को धर्म सम्मत और अल्लाह की आवाज मानते हैं। यदि उनके व्यक्तिगत मामलों में बल पूर्वक हस्तक्षेप की कोशिश की गई तो परिणाम हिन्दू कोड बिल से भी ज्यादा भयानक हो सकते हैं। रही बात भाजपा कि तो अयोध्या फैसले के बाद कुछ लोग भारत में ऐसा माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं कि भाजपा हिंदुत्व और संघ का एजेंडा आगे बढ़ा रही है अतः यह उचित समय नहीं कहा जा सकता। नेहरू जी की चिंता आज भी हमारे शीर्ष नेताओं में विद्यमान है। हाँ धीरे धीरे आम सहमति से इस दिशा में आगे अवश्य बढ़ा जा सकता है।

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