कुपोषण भुखमरी और बाल मजदूरी से जूझता बचपन
संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ द वर्ल्ड चिल्ड्रेन' के अनुसार भारत में प्रत्येक वर्ष कुपोषण के कारण 5 वर्ष से कम आयु के 10 लाख से भी अधिक बच्चे काल के गाल में समा जाते हैं।इसी रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि दुनिया के 5 वर्ष की कम आयु के एक तिहाई बच्चे कुपोषण के शिकार हैं जबकि भारत में यह अनुपात आधा है।इसी तरह केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी प्रथम राष्ट्रीय पोषण सर्वे में 10 वर्ष से 19 वर्ष आयु के 25% बच्चे कुपोषित पाए गए हैं।वहीं हंगर इंडेक्स की 117 देशों की सूची में भारत का स्थान 102 वां है।इस मामले में हमारे पड़ोसी देशों की स्थिति हमसे अच्छी है।ऐसे गरीब परिवार के कुपोषित बच्चे 5 वर्ष की उम्र भगवान भरोसे यदि पार कर जााते हैं तो वे स्कूल जाने के बजाय बाल मजदूरी या भिक्षाटन के लिए मजबूर हो जाते हैं। सन् 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 5-14 वर्ष की आयु के एक करोड़ से भी अधिक बच्चे बाल मजदूर हैं। इसमें एससी एसटी वर्ग तथा ग्रामीण क्षेत्रों के बाल मजदूर ज्यादा हैं, क्योंकि इन समूहों के पालकों में जागरूकता का स्तर बहुत ही निम्न है। यदि राज्यों की बात की जाए तो बाल मजदूर सबसे ज्यादा यूपी बिहार राजस्थान मध्यप्रदेश में हैं। इसके लिए हम केवल सरकार को ही जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते बल्कि सरकार से ज्यादा हम जिम्मेदार हैं। अतः अपने बच्चों के भविष्य की बेहतरी के लिए एक अभियान के तहत जन जागरूकता लानी होगी। विभिन्न मंचों पर चर्चा करनी होगी, मीडिया को भी ध्यान देना होगा। यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो अपने अंधकारमय भविष्य की आगवानी के लिए तैयार हो जाएं।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 24 के तहत बाल श्रम निषेध किया गया है। कुछ संगठन बालश्रम को रोकने के लिए प्रयास भी कर रहे हैं लेकिन पर्याप्त सफलता नहीं मिल रही है। इसका कारण यह है कि बालश्रम को रोकने के लिए हम सही दिशा में प्रयास नहीं कर रहे हैं। हमें बड़े स्तर पर जन जारूकता अभियान चलाना होगा कि शादी के पहले व्यक्ति को आत्मनिर्भर होने के लिए प्रयत्न करना चाहिए और बच्चे तो तभी पैदा करना चाहिए जब उनके पालन पोषण की छमता व आत्मविश्वास आ जाए। बच्चे के जन्म के पश्चात एक बागवान की तरह उसकी समुचित देखभाल करनी चाहिए।
वृद्धाश्रम और माता-पिता के तिरस्कार की खबरे अक्सर चर्चा में रहती हैं। इस विषय पर बहुत ज्यादा लेखन और चर्चा भी होती है, यहां तक की इस पृष्ठभूमि पर कई फिल्में भी बनाई जा चुकी हैं लेकिन इसके विपरीत इस बात पर चर्चा होते या किसी को लिखते नहीं देखा कि नजाने कितने माता-पिता ऐसे हैं जो बच्चे पैदा करके सड़क पर भीख मांगने के लिए छोड़ देते हैं या भगवान भरोसे बच्चों को जीने के लिए मजबूर कर देते हैं। न तो उनके पढ़ने लिखने की कोई व्यवस्था करते हैं और न ही भरण पोषण की। बच्चे क्या कर रहे हैं क्या नहीं , इसकी उनको चिंता ही नहीं होती है। ऐसे लोगो के लिए मेरा कथन है कि जिस प्रकार से एक नपुंसक को शादी करने का अधिकार नहीं है उसी प्रकार जो व्यक्ति 20-25 साल तक अपने बच्चों के पालन-पोषण और पढ़ने-लिखने की व्यवस्था नहीं कर सकता तो उसे बच्चे पैदा करने का कोई अधिकार नहीं। पढ़ाई लिखाई एक तपस्या जैसी होती है, जो बच्चे को सुखदाई प्रतीत नहीं होती। अतः बच्चे प्रारंभ में पढ़ाई लिखाई से भागते हैं इसलिए माता पिता को बच्चों को पढ़ने लिखने के लिए प्रेरित करना चाहिए। जब बच्चों की पढ़ाई में मन लगने लगेगा तो आगे का रास्ता वह अपने आप ही तय कर लेंगे। लेकिन उनकी जरूरत की चीजें अभी भी आप को ही उपलब्ध करानी होगी।
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