मेरा यह लेख राष्ट्रीय समाचार पत्र जनसत्ता नई दिल्ली से प्रकाशित हो चुका है।
माननीय प्रधानमंत्री मोदीजी यह आह्वान किए हैं कि गांधीजी के विचारों के प्रचार प्रसार हेतु सिने जगत को आगे आना चाहिए तथा उनके विचारों पर आधारित फिल्में बनना चाहिए। लेकिन इस संबंध में मै यह कहना चाहता हूँ कि आम जनता को गांधीजी के विचारों को समझने से ज्यादा जरूरी है कि राजनीति से जुड़े लोग गांधीजी के विचारों समझे और उसका अनुसरण करें। इस संदर्भ में गांधीजी का जो विचार सबसे ज्यादा प्रासंगिक है वह है "राजनीति का आध्यात्मीकरण"।
वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था में फैली बुराइयों को समाप्त करने का सबसे प्रभावी गांधीवादी विचार है- राजनीति का आध्यात्मीकरण। वर्तमान राजनीति की बुराइयों जैसे भ्रष्टाचार, क्षेत्रवाद, भाषावाद, साम्प्रदायिकता, अवसरवाद आदि को समाप्त करके उसके स्थान पर राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, सर्वोदय, सत्य, अहिंसा, नैतिकता, परोपकार, सादगी, समर्पण, सेवाभाव, त्याग और बलिदान जैसे मूल्यों को राजनीति में शामिल करना ही राजनीति का आध्यात्मीकरण है।
प्राचीन भारतीय राजनीतिक विचारक कौटिल्य राजनीति को धर्म और नैतिकता से अलग कर के देखते थे। उनका कहना था कि राष्ट्रीय उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए शाम दाम दण्ड भेद किसी भी नीति का अनुसरण किया जा सकता है। अर्थात हमारा साध्य शुभ है तो साधनों की परवाह नहीं करनी चाहिए। कौटिल्य ने अपने अखंड भारत के सपने को साकार करने के लिए उक्त मार्ग का ही अनुसरण किया। पाश्चात्य राजनीति में इन विचारों का प्रणेता मैकियावली को माना जाता है इसी लिए कौटिल्य को भारत का मैकियावली कहा जाता है।
लेकिन आधुनिक भारतीय चिंतक गांधीजी कौटिल्य और मैंकियावली के विचारों के विपरीत विचार रखते हैं। गांधीजी का मानना था कि न केवल साध्य पवित्र होना चाहिए बल्कि साधन भी पवित्र होना चाहिए। इसीलिए गांधीजी स्वतंत्रता के लिए हिंसक मार्ग का समर्थन न करके सत्याग्रह असहयोग सविनय अवज्ञा सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर आजादी प्राप्त करने की राह देशवासियों को दिखाते हैं। गांधीजी के इन्हीं विचारों को राजनीति का आध्यात्मीकरण कहते हैं।
राज्य पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि है। राज्य को केवल ईश्वर की इच्छा का क्रियान्वयन करना चाहिए अर्थात कोई भी कानून बनाते समय विधायिका को इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या यह ईश्वर की इच्छा के अनुरूप है? यदि है तो उसे कानून का रूप देना उचित होगा अन्यथा उसे पारित होने से विधायकों को रोकना होगा। इसी प्रकार कार्यपालिका के सदस्यों को ईश्वर के एजेंट के रूप में कार्य करना चाहिए। उनको सदैव इस बात पर विचार करते रहना होगा कि मेरे जगह पर यदि ईश्वर स्वयं होते तो वो क्या करते तथा अन्तःप्रज्ञा की आवाज के अनुसार कार्य करना चाहिए क्योंकि अन्तःप्रज्ञा की आवाज ईश्वर की आवाज मानी जाती है। इसी प्रकार न्यायपालिका को भी विधिक न्याय के स्थान पर सामाजिक एवं प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्तों का पालन करते हुए न्याय करना चाहिए।
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