सोशल मीडिया पर मैंने एक प्रश्न पर चर्चा होते देखा कि कुछ लोग भारत माता की जय और वन्दे मातरम् कहने से हिचकिचाते हैं।कुछ लोग खुल कर विरोध करते हैं और कुछ लोग पीठ पीछे।इस सन्दर्भ में सवाल है कि क्या ईश्वर भक्ति और राष्ट्रभक्ति में कोई विरोध है या दोनों एक दूसरे के पूरक हैं तथा इनमें कोई विरोध नहीं है??
इस प्रश्न के उत्तर में मै यही कहना चाहता हूं कि
राष्ट्रभक्ति और ईश्वरभक्ति में कोई विरोध नहीं। कुछ वर्षों पहले इलाहाबाद के एक स्कूल में राष्ट्रगान के न गाये जाने तथा इसके पक्ष में प्रबंधक के तर्क "भारत हमारा भाग्य विधाता नहीं है" को जानने के बाद हमें यह बात समझ में आती है कि देश को आजाद हुए भले ही 72 वर्ष हो गए हो, लेकिन हम अपने आपको स्वतंत्र नहीं कह सकते क्योकि स्वतंत्रता का मतलब होता है 'आत्मनिर्णय की आजादी'। यह बात चाहे देश के लिए हो या व्यक्ति के लिए। देश की आजादी के साथ देश की स्वतंत्रता का प्रश्न तो समाप्त हो गया है लेकिन व्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न पहले जैसा ही बना हुआ है क्योकि आत्मनिर्णय की आजादी के लिए केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है कि आपके ऊपर वाह्य बंधनों का आभाव हो वल्कि यह भी आवश्यक है की हम बौद्धिक रूप से इतने सक्षम हो कि आत्मनिर्णय कर सके, सही-गलत में भेद कर सकें। आलम तो यह है कि कोई भी सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति भी आपको अपना बौद्धिक शिकार बना लेता है। उदाहरण के तौर पर जितने भी फिदाईन हैं वे किसी ना किसी के बौद्धिक शिकार हैं। इसी प्रकार के ढेर सारे उदहारण दिए जा सकते हैं। ऐसे लोग किसी भी दशा में स्वतन्त्र नहीं कहे जा सकते। यदि हम सूक्ष्मता से विश्लेषण करें तो आपको यह ज्ञात होगा की ईश्वर की भक्ति और राष्ट्रभक्ति में कोई विरोध नहीं है। दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं क्योकि दोनों का उद्देश्य एक है। ईश्वर की इच्छाओं की अभिव्यक्ति राज्य द्वारा होती हैं। यदि पृथ्वी पर ईश्वर का अवतरण हो जाये तो ईश्वर भी वहीँ कुछ करेगा जो एक लोक कल्याणकारी आदर्श राज्य करता है। इसी लिए शायद महान जर्मन दार्शनिक हीगल ने राज्य को पृथ्वी पर ईश्वर का अवतरण माना था। लेकिन इस बात को समझने के लिए हमें पूर्वाग्रह से मुक्त होकर स्वविवेक का इस्तेमाल करना होगा, विवेकवान बनना होगा।#apsvichar
Bharat mata ki jai
जवाब देंहटाएंVandematram