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एससी एसटी और क्रीमीलेयर

सर्वोच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया कि एससी एसटी में भी क्रीमीलेयर का प्रावधान किया जाए और क्रीमीलेयर को आरक्षण से दूर रखा जाए। न्यायालय का यह निर्णय स्वागत योग्य है लेकिन इसके बावजूद सरकार ने पुनर्विचार याचिका लगा कर लोगों को दिग्भ्रमित कर दिया है। हलाकि सरकार का यह कदम विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे आरोप कि भाजपा आरक्षण विरोधी है, को निराधार साबित करना है और इसी संदर्भ में एससी एसटी के लिए आरक्षण की मियाद को 10 वर्ष बढ़ाना भी देखा जाना चाहिए लेकिन ज्यादातर लोग सरकार के इस कदम को सही ठहरा रहे हैं परन्तु यदि निरपेक्ष रूप से विचार किया जाए तो कोर्ट का निर्णय ही सही प्रतीत होता है क्योंकि एससी एसटी वर्ग का एक निचला तपका आज भी अपनी बारी आने के लिए प्रतीक्षारत है। देखने में आया है कि इस वर्ग के कुछ अति संपन्न लोग लगातार आरक्षण का लाभ उठाकर आगे और आगे निकलते जा रहे हैं लेकिन जो लोग इस वर्ग के वास्तव में आरक्षण के हकदार हैं वो लाभान्वित नहीं हो पा रहे हैं। एससी एसटी में क्रीमीलेयर बनाए जाने का विरोध भी ऐसे ही लोग कर रहे हैं जो लगातार इस सुविधा का लाभ...

संपादकीय लेख: धर्म को पुनः परिभाषित करने की जरूरत

आजकल धर्म के नाम पर सोशल मीडिया में बहुत ही भड़काऊ और समाज को बांटने वाली बातें हो रही हैं अतः यह जरूरी हो जाता है कि हम जाने और समझें कि धर्म क्या है? "ईश्वर की इच्छा की अभिव्यक्ति ही धर्म है।" कल्पना कीजिए यदि ईश्वर पृथ्वी पर अवतरित हो जाए तो वो जो भी जीव-जगत के कल्याण के लिए करना चाहेगा वहीं धर्म है। कुछ विचारक धारण करने योग्य अर्थात स्वीकार करने योग्य विचारों के समूह को धर्म माना है, लेकिन हमारी परिभाषा में इस परिभाषा का सार समाहित है। इसके अतिरिक्त अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य परिभाषा के अनुसार " ऐसे विचारों का समूह जो सम्पूर्ण मानवता को एकता के बंधन में बांध दे, धर्म कहलाता है। " लेकिन आज के धर्म मानवता को एकता के बंधन में बांधने के बजाय मानवता को हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई में विभाजित कर दिए हैं जो कि किसी भी परिभाषा के अनुसार सही नहीं प्रतीत होता। इन्हें धर्म के बजाय पंथ कहना अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि धर्म यूनिवर्सल सत्य होता है जो अलग अलग लोगों के अनुसार अलग अलग नहीं हो सकता।आज धर्म के नाम पर लोग एक दूसरे के दुश्मन होते जा रहे हैं जो न तो राष...

संपादकीय लेख: भारत में गरीबी के कारण और निवारण के उपाय

भारत में गरीबी की जड़े बहुत गहरी हैं।इसकी जड़े वैदिक कालीन सामाजिक व्यवस्था में देखी जा सकती हैं।समाज का जो चौथा वर्ग था जिसे शूद्र कहा जाता था, को उत्पादन के साधनों पर स्वामित्त्व नहीं था।उनका कार्य था ऊपर के तीन वर्गों की सेवा करना।लेकिन इस सेवी वर्ग के भी दो भाग थे। प्रथम भाग जो ऊपर के तीन वर्गों के साथ प्रत्यक्ष जुड़े थे जैसे नाई धोबी लोहार कहार आदि । ये अपनी सेवा के बदले पर्याप्त पारितोषक प्राप्त कर लेते थे इसलिए इनका जीवन यापन किसी तरह से होता रहता था कोई विशेष समस्या नहीं थी।लेकिन दूसरा भाग जिसे अस्पृश्य समझा जाता था उन्हें इस प्रकार का कोई पारितोषक नहीं मिलता था क्योकि ये ऊपर के तीनों वर्गों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े नहीं थे।इनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति बहुत दयनीय थी। उस समय की राजनितिक व्यवस्था राजतंत्रात्मक थी। राज्य की सम्पूर्ण भूमि पर राजा का अधिकार होता था।राजा किसानों के माध्यम से खेती करवाता था। उसका कुछ भाग राजा को मिलता था और शेष किसानों को।जब भारत में विदेशी आक्रमणकारी आए तो अपना साम्राज्य स्थापित कर भारत में ही बस गए। वे स्वयं को भारतीय समाज में विलीन करना च...

बाल दिवस विशेष

कुपोषण भुखमरी और बाल मजदूरी से जूझता बचपन संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ द वर्ल्ड चिल्ड्रेन' के अनुसार भारत में प्रत्येक वर्ष कुपोषण के कारण 5 वर्ष से कम आयु के 10 लाख से भी अधिक बच्चे काल के गाल में समा जाते हैं।इसी रिपोर्ट  में यह भी बताया गया है कि दुनिया के 5 वर्ष की कम आयु के एक तिहाई बच्चे कुपोषण के शिकार हैं जबकि भारत में यह अनुपात आधा है।इसी तरह केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी प्रथम राष्ट्रीय पोषण सर्वे में 10 वर्ष से 19 वर्ष  आयु के 25% बच्चे कुपोषित पाए गए हैं।वहीं हंगर इंडेक्स की 117 देशों की सूची में भारत का स्थान 102 वां है।इस मामले में हमारे पड़ोसी देशों की स्थिति हमसे अच्छी है।ऐसे गरीब परिवार के कुपोषित बच्चे 5 वर्ष की उम्र भगवान भरोसे यदि पार कर जााते हैं तो वे स्कूल जाने के बजाय बाल मजदूरी या भिक्षाटन के लिए मजबूर हो जाते हैं। सन् 2017 की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 5-14 वर्ष की आयु के एक करोड़ से भी अधिक बच्चे बाल मजदूर हैं। इसमें एससी एसटी वर्ग तथा ग्रामीण क्षेत्रों के बाल मजदूर ज्यादा हैं, क्योंकि इन समूहों क...

संपादकीय लेख : एक समान सिविल संहिता का राग फिर शुरू

अब जब धारा 370 और अयोध्या विवाद का मामला सुलझ गया है तो कुछ अति उत्साही तथाकथित राष्ट्रवादी लोग एक समान सिविल संहिता का राग अलापना शुरू कर दिए हैं। इन दिनों सोशल मीडिया में इस मुद्दे पर काफी चर्चा है। अतः यह लाजमी हो जाता है कि इस मुद्दे के सभी पहलुओं पर चर्चा हो, न कि एक पक्षीय। एक समान सिविल संहिता की व्यवस्था मूल संविधान में ही किया जाना चाहिए था लेकिन पंडित नेहरू का मानना था कि अभी अभी साम्प्रदायिक आधार पर देश का विभाजन हुआ है और भारत के मुस्लिम भाई असहज महसूस कर रहे हैं, ऐसी स्थिति में यदि उनके व्यक्तिगत मामलों में कानूनी हस्तक्षेप किया जाएगा तो वे भारत में अपने भविष्य को लेकर सशंकित हो जाएंगे। लेकिन इसके बावजूद भी एक समान सिविल संहिता के प्रावधान को संविधान के भाग-4 में नीति निदेशक तत्वों के अंतर्गत अनुच्छेद-44 में जगह दिया गया। इसमें यह कहा गया कि राज्य देश के समस्त भाग में रहने वाले नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता के निर्माण का प्रयास करेगा अर्थात आने वाली सरकारों का यह कर्तव्य होगा कि वे एक समान सिविल संहिता को लागू करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाए...

भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन का मामला

भारतीय नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन का मामला वर्तमान सरकार संसद के शीत कालीन सत्र में भारतीय नागरिकता संशोधन विधेयक ला सकती है। चर्चा है कि इस अधिनियम में संशोधन करके सरकार ऐसे प्रावधान करना चाहती है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान तथा बांग्लादेश के हिंदू सिख जैन बौद्ध लोगों को भारतीय नागरिकता प्राप्त करने में आसानी हो, लेकिन मुस्लिम लोगों को इसका लाभ प्राप्त नहीं होगा। विपक्ष को इसी भेदभाव के कारण ही आपत्ति है।अब देखिए आगे क्या होता है। हालाकि इस संशोधन का कारण यह है कि इन देशों में हिन्दू सिख जैन बौद्ध बहुत ही ज्यादा प्रताड़ित हैं अतः इन देशों के जो लोग भारत की नागरिकता चाहते हैं, भारत उनका स्वागत करना चाहता है। लेकिन यदि बात मुस्लिम जनसंख्या की कीजाए तो उनके साथ ऐसी कोई प्राब्लम नहीं है और बांग्लादेश से आए मुस्लिम शरणार्थियों के कारण पहले से ही एक बड़ी समस्या उत्पन्न हो गई है। भारत और बांग्लादेश की अंतर्राष्ट्रीय सीमा पूर्णतया कृत्रिम है। अतः बांग्लादेश से लोग चोरी छुपे भारत में आते ही रहते हैं। बांग्लादेश से सटे भारतीय राज्य पश्चिमी बंगाल असम मेघालय त्रिपुरा तथा मिजोरम में...

गांधीवाद पर प्रकाशित मेरा एक और संपादकीय लेख

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