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संपादकीय लेख: धर्म को पुनः परिभाषित करने की जरूरत


आजकल धर्म के नाम पर सोशल मीडिया में बहुत ही भड़काऊ और समाज को बांटने वाली बातें हो रही हैं अतः यह जरूरी हो जाता है कि हम जाने और समझें कि धर्म क्या है?
"ईश्वर की इच्छा की अभिव्यक्ति ही धर्म है।"
कल्पना कीजिए यदि ईश्वर पृथ्वी पर अवतरित हो जाए तो वो जो भी जीव-जगत के कल्याण के लिए करना चाहेगा वहीं धर्म है। कुछ विचारक धारण करने योग्य अर्थात स्वीकार करने योग्य विचारों के समूह को धर्म माना है, लेकिन हमारी परिभाषा में इस परिभाषा का सार समाहित है। इसके अतिरिक्त अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य परिभाषा के अनुसार " ऐसे विचारों का समूह जो सम्पूर्ण मानवता को एकता के बंधन में बांध दे, धर्म कहलाता है। " लेकिन आज के धर्म मानवता को एकता के बंधन में बांधने के बजाय मानवता को हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई में विभाजित कर दिए हैं जो कि किसी भी परिभाषा के अनुसार सही नहीं प्रतीत होता। इन्हें धर्म के बजाय पंथ कहना अधिक उपयुक्त होगा क्योंकि धर्म यूनिवर्सल सत्य होता है जो अलग अलग लोगों के अनुसार अलग अलग नहीं हो सकता।आज धर्म के नाम पर लोग एक दूसरे के दुश्मन होते जा रहे हैं जो न तो राष्ट्र के लिए शुभ है और न ही मानवता के लिए। अतः धर्म के ठेकेदारों को पुनः विचार करने की जरूरत है।

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