भारत में गरीबी की जड़े बहुत गहरी हैं।इसकी जड़े वैदिक कालीन सामाजिक व्यवस्था में देखी जा सकती हैं।समाज का जो चौथा वर्ग था जिसे शूद्र कहा जाता था, को उत्पादन के साधनों पर स्वामित्त्व नहीं था।उनका कार्य था ऊपर के तीन वर्गों की सेवा करना।लेकिन इस सेवी वर्ग के भी दो भाग थे। प्रथम भाग जो ऊपर के तीन वर्गों के साथ प्रत्यक्ष जुड़े थे जैसे नाई धोबी लोहार कहार आदि । ये अपनी सेवा के बदले पर्याप्त पारितोषक प्राप्त कर लेते थे इसलिए इनका जीवन यापन किसी तरह से होता रहता था कोई विशेष समस्या नहीं थी।लेकिन दूसरा भाग जिसे अस्पृश्य समझा जाता था उन्हें इस प्रकार का कोई पारितोषक नहीं मिलता था क्योकि ये ऊपर के तीनों वर्गों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े नहीं थे।इनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति बहुत दयनीय थी।
उस समय की राजनितिक व्यवस्था राजतंत्रात्मक थी। राज्य की सम्पूर्ण भूमि पर राजा का अधिकार होता था।राजा किसानों के माध्यम से खेती करवाता था। उसका कुछ भाग राजा को मिलता था और शेष किसानों को।जब भारत में विदेशी आक्रमणकारी आए तो अपना साम्राज्य स्थापित कर भारत में ही बस गए। वे स्वयं को भारतीय समाज में विलीन करना चाहते थे। उनके सम्मुख यह समस्या थी कि वे किस वर्ग में अपने आपको शामिल करें।चूँकि भारतीय सामाजिक व्यवस्था के अनुसार शासक क्षत्रिय वर्ग के लोग ही हो सकते थे। इसलिए विदेशी आक्रांताओं ने अपना क्षत्रियकरण करना चाहा।उनको पता चला कि भारत में यह कार्य ब्राह्मण ही करा सकते हैं अतः उन्होंने ब्राह्मणों से संपर्क किया।ब्राह्मणों ने कहा कि हम आपका ये कार्य तो कर देंगे बदले में हमे क्या लाभ प्राप्त होगा?उनको जबाब मिला कि आपको इच्छानुसार भूदान प्राप्त होगा।ब्राह्मण तैयार हो गए। बहुत ढेर सारे विदेशी आक्रांताओ का क्षत्रियकरण हुआ।बदले में ब्राह्मणों को पर्याप्त भूदान प्राप्त हुआ।ऐतिहासिक साक्ष्य ताम्र पत्रों में इसका उल्लेख मिलता है। सर्वप्रथम सातवाहनों ने इस प्रकार से भूदान किए। जिन ब्राह्मणों को भूदान मिला, वे कभी खेती तो किये नहीं थे, फिर भूमि का क्या करते,तो वे इस भूमि को छोटे छोटे बटाई किसानों को एक समझौते के तहत दे दिए अर्थात जमीन पर खेती किसान करते और उपज का एक निश्चित भाग भूस्वामी को मिलना था।यहीं से सामंतवादी व्यवस्था का उदय होता है।ये नवीन ब्राह्मण भूस्वामी वर्ग भूमिहार कहलाये।अब ये कर्मकांड से दूर हो गए । धीरे धीरे क्षत्रियों की तरह शान शौकत इनकी भी आदत बन गयी।इनके द्वारा शोषण की चर्चा भी बहुत होती है क्या पता कितना सही है।कुल मिलाकर समाज के अति निम्न वर्ग अभी भी उपेक्षित साधनहीन बने रहे।कमोबेस यही व्यवस्था मध्यकाल तक चलती रही। मध्यकालीन जितनी भी ऐतिहासिक इमारतें हैं वे सब गरीबों किसानों और मजदूरों के खून पसीने की प्रतीक हैं इसीलिए ये हमारे लिए महत्वपूर्ण भी है।
अंग्रेजो के आगमन के बाद शोषण का चक्र और तेज हो गया।लगान की दर बहुत ऊँची हो गयी । लगान वसूल करने का कार्य उन्हें ही सौंपा गया जो दबंग थे,ज्यादा से ज्यादा लगान वसूल कर अंग्रेजों को खुश करते थे।अब ये लोग जमीदार कहलाए।इनके शोषण की भी बहुत चर्चा होती है। खेत में आनाज हो या नहीं, लगान जमा करना ही होता था।इसके विरोध में बड़े बड़े आंदोलन भी हुए।यानी इस समय भूमिहीन तो गरीब थे ही,खेतिहर किसान भी गरीब हो गए। हस्तशिल्पी भी बेगार हो गए क्योकि ब्रिटेन के औद्योगीकरण से मीलों से बने उत्पाद की तुलना में भारतीय उत्पाद प्रतियोगिता नहीं कर पा रहे थे।अतः भारत का हस्तशिल्प चौपट हो गया अर्थात समाज का एक बड़ा तपका गरीबी एवं भुखमरी की चपेट में था। लाखों की जनसंख्या अकाल के भेट चढ़ जाती थी।
आजादी के बाद भारत में सुधार के लिए विभिन्न प्रयास किए गए।सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से कमजोर वर्ग को सरकारी सेवाओं में आरक्षण दिया गया। जमीदारी उन्मूलन किया गया, विनोबा भावे जी के द्वारा भूदान आंदोलन चलाया गया तथा प्राप्त भूमि को भूमिहीनों में वितरित किया गया लेकिन इसके बावजूद भी भूमिहीन वर्ग विशेष लाभान्वित नहीं हो पाए। पंचवर्षीय योजनाएं लागू की गई।गरीबी उन्मूलन, बेरोजगारी उन्मूलन कार्यक्रम चलाए गए। सार्वजनिक वितरण प्रणाली की व्यवस्था की गई लेकिन अभी भी भारत की जनसंख्या का एक बड़ा भाग लाभान्वित नहीं हो पाया है।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी एक रिपोर्ट ' स्टेट आफ द वर्ल्ड चिल्ड्रेन ' में यह बताया गया है कि दुनियां के 70 करोड़ ( 5 वर्ष से कम आयु के) बच्चों में से एक तिहाई कुपोषण के शिकार हैं जबकि भारत में यह अनुपात आधा है।इसी प्रकार केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी प्रथम राष्ट्रीय पोषण सर्वे में 10-19 वर्ष आयु के 25% बच्चों को कुपोषित बताया गया है।हंगर इंडेक्स की 117 देशों की सूची में भारत का स्थान 102 वां है।इस मामले में हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका हमसे अच्छी स्थिति में हैं। ग़रीबी रेखा का निर्धारण मानक अति निम्न रखे जाने के बावजूद यू एन रिपोर्ट के अनुसार भारत में अभी भी लगभग 27.9% लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। अब यह सवाल उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है? सरकार या समाज या फिर परिवार? मेरे समझ से जिम्मेदार कमाधिक तीनों हैं।
भारत के नोबेल पुरस्कार विजेता, बालश्रम के प्रति संवेदना व्यक्त करने वाले पहले विचारक कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि "यदि विकास योजनाएं वयस्कों को ध्यान में रखकर बनाई जाए तो समझिए नजर आगामी चुनाव पर है और यदि योजनाएं बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई जाए तो समझिए कि अगली पीढ़ी तक के विकास पर नजर है। "
मतलब साफ है सरकारी योजनाएं सदैव इस बात को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं कि अगले चुनाव में उन्हें अधिक से अधिक फायदा कैसे मिले। क्यों न सरकार को दोषी ठहराया जाए? यहां बात कुपोषण की हो रही है, जानकारी के लिए बता दूं कि भारत में एक लाख करोड़ रुपए का अनाज प्रति वर्ष बर्बाद हो जाता है लेकिन पात्र व्यक्ति को नहीं मिल पाता। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत कम मूल्य पर गेहूं चावल के वितरण की व्यवस्था सरकार द्वारा की गई है लेकिन वह भी कालाबाजारी और भ्रष्टाचार के भेट चढ़ गयी है। ऐसे लोगों के बीपीएल और अंत्योदय कार्ड बन गए हैं जिनको इस अनाज की आवश्यकता ही नहीं है अर्थात बाजार कीमत पर अनाज खरीदने में सक्षम हैं या फिर वे स्वयं उत्पादक और विक्रेता हैं। ऐसे लोग पीडीएस से सस्ते दाम पर अनाज खरीद कर तुरंत बाजार कीमत पर बेच कर मुनाफा कमाते हैं। जो पात्र हैं बेचारे वो 100-200 रुपए की व्यवस्था करने में दो चार दिन लेट हुए नहीं कि पीडीएस से अनाज खत्म हो जाने की सूचना मिलती है। अंत में मजबूूर होकर बाजार कीमत पर उधार अनाज क्रय करते हैं जिससे उत्तरोत्तर कर्ज के बोझ तले दबते चले जाते हैं और गरीबी के इस कुचक्र से तंग आकर अंत में आत्म हत्या कर लेते हैं। बच्चे बेसहारा मजबूर होकर भिक्षावृत्ति, बाल मजदूरी तथा शोषण का शिकार हो जाते हैं।
कुछ लोग गरीबी और भुखमरी के लिए समाज को जिम्मेदार समझते हैं क्योंकि भाग्य की थ्योरी हमारे समाज में कुछ ज्यादा ही प्रचलन में है। लोग कहते हैं कि भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को कुछ भी नहीं मिलता। ऐसी ही बातें सोचकर कुछ लोग हाथ पे हाथ रख कर समय पास करते जाते हैं और अपनी गरीबी को अपना भाग्य समझ लेते हैं। अपने और अपने बच्चों के भविष्य के लिए कुछ सोचते ही नहीं और कुछ सोचते हैं तो करते नहीं। एक फिल्म मुझे याद आती है मन जिसमें हीरो आवारगी की जिंदगी जीता है लेकिन जब उसे हीरोइन से प्रेम हो जाता है तो वो घर बसाने की सोचता है लेकिन हीरोइन बोलती है कि तुम्हारे पास तो घर ही नहीं है तो हमें रखोगे कहां? तब हीरो एक वर्ष का समय मांगता है कि एक वर्ष में मै वो सब कुछ आपको दूंगा जो आपने अपने जीवनसाथी से अपेक्षा कर रखी है और हीरो एक वर्ष में अपना वादा पूरा भी करता है। उस फिल्म में हीरो रात दिन हमेशा अपने काम में लगा रहता था। एक व्यक्ति ने उससे पूछा, सोते हो कब? तब हीरो उत्तर दिया इतने दिनों तक सो ही तो रहा था अब जाके जागा हूँ। आप सोच रहे होंगे ऐसा केवल फिल्मों में होता है लेकिन हकीकत में भी ऐसे उदाहरण हैं। एक वर्ष में सब कुछ तो नहीं लेकिन अपने परिवार के लिए उचित भरण-पोषण की व्यवस्था अवश्य ही की जा सकती है। लेकिन लोग इतना भी नहीं करते हैं, मन के हीरो की तरह सोते ही रहते हैं।
भारत में कुपोषण व गरीबी का एक और बड़ा कारण है हमारे रीति रिवाज परंपराएं। लोग शादी-विवाह, कर्मकांड व त्योहारों में अनावश्यक पैसे की बर्बादी करते हैं। जिनके पास पैसा है वो खर्च करे तो उसे उचित मान भी सकते हैं लेकिन लोग कर्ज लेकर खर्च करने को मजबूर होते हैं अपनी प्रतिष्ठा और सामाजिक दबाव के कारण। कहते हैं अमीर अपनी अमीरी को दिखाने के लिए पैसे बर्बाद करता है। इससे गरीब लोगों पर प्रेसर क्रिएट होता है और वो अपनी गरीबी को छिपाने व अपने झूठे स्वाभिमान की रक्षा के लिए मजबूर होकर खर्च करता है जिससे कर्ज के बोझ व गरीबी के कुचक्र में फंसता चला जाता है।
भारत के नोबेल पुरस्कार विजेता, बालश्रम के प्रति संवेदना व्यक्त करने वाले पहले विचारक कैलाश सत्यार्थी का मानना है कि "यदि विकास योजनाएं वयस्कों को ध्यान में रखकर बनाई जाए तो समझिए नजर आगामी चुनाव पर है और यदि योजनाएं बच्चों को ध्यान में रखकर बनाई जाए तो समझिए कि अगली पीढ़ी तक के विकास पर नजर है। "
मतलब साफ है सरकारी योजनाएं सदैव इस बात को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं कि अगले चुनाव में उन्हें अधिक से अधिक फायदा कैसे मिले। क्यों न सरकार को दोषी ठहराया जाए? यहां बात कुपोषण की हो रही है, जानकारी के लिए बता दूं कि भारत में एक लाख करोड़ रुपए का अनाज प्रति वर्ष बर्बाद हो जाता है लेकिन पात्र व्यक्ति को नहीं मिल पाता। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के तहत कम मूल्य पर गेहूं चावल के वितरण की व्यवस्था सरकार द्वारा की गई है लेकिन वह भी कालाबाजारी और भ्रष्टाचार के भेट चढ़ गयी है। ऐसे लोगों के बीपीएल और अंत्योदय कार्ड बन गए हैं जिनको इस अनाज की आवश्यकता ही नहीं है अर्थात बाजार कीमत पर अनाज खरीदने में सक्षम हैं या फिर वे स्वयं उत्पादक और विक्रेता हैं। ऐसे लोग पीडीएस से सस्ते दाम पर अनाज खरीद कर तुरंत बाजार कीमत पर बेच कर मुनाफा कमाते हैं। जो पात्र हैं बेचारे वो 100-200 रुपए की व्यवस्था करने में दो चार दिन लेट हुए नहीं कि पीडीएस से अनाज खत्म हो जाने की सूचना मिलती है। अंत में मजबूूर होकर बाजार कीमत पर उधार अनाज क्रय करते हैं जिससे उत्तरोत्तर कर्ज के बोझ तले दबते चले जाते हैं और गरीबी के इस कुचक्र से तंग आकर अंत में आत्म हत्या कर लेते हैं। बच्चे बेसहारा मजबूर होकर भिक्षावृत्ति, बाल मजदूरी तथा शोषण का शिकार हो जाते हैं।
कुछ लोग गरीबी और भुखमरी के लिए समाज को जिम्मेदार समझते हैं क्योंकि भाग्य की थ्योरी हमारे समाज में कुछ ज्यादा ही प्रचलन में है। लोग कहते हैं कि भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को कुछ भी नहीं मिलता। ऐसी ही बातें सोचकर कुछ लोग हाथ पे हाथ रख कर समय पास करते जाते हैं और अपनी गरीबी को अपना भाग्य समझ लेते हैं। अपने और अपने बच्चों के भविष्य के लिए कुछ सोचते ही नहीं और कुछ सोचते हैं तो करते नहीं। एक फिल्म मुझे याद आती है मन जिसमें हीरो आवारगी की जिंदगी जीता है लेकिन जब उसे हीरोइन से प्रेम हो जाता है तो वो घर बसाने की सोचता है लेकिन हीरोइन बोलती है कि तुम्हारे पास तो घर ही नहीं है तो हमें रखोगे कहां? तब हीरो एक वर्ष का समय मांगता है कि एक वर्ष में मै वो सब कुछ आपको दूंगा जो आपने अपने जीवनसाथी से अपेक्षा कर रखी है और हीरो एक वर्ष में अपना वादा पूरा भी करता है। उस फिल्म में हीरो रात दिन हमेशा अपने काम में लगा रहता था। एक व्यक्ति ने उससे पूछा, सोते हो कब? तब हीरो उत्तर दिया इतने दिनों तक सो ही तो रहा था अब जाके जागा हूँ। आप सोच रहे होंगे ऐसा केवल फिल्मों में होता है लेकिन हकीकत में भी ऐसे उदाहरण हैं। एक वर्ष में सब कुछ तो नहीं लेकिन अपने परिवार के लिए उचित भरण-पोषण की व्यवस्था अवश्य ही की जा सकती है। लेकिन लोग इतना भी नहीं करते हैं, मन के हीरो की तरह सोते ही रहते हैं।
भारत में कुपोषण व गरीबी का एक और बड़ा कारण है हमारे रीति रिवाज परंपराएं। लोग शादी-विवाह, कर्मकांड व त्योहारों में अनावश्यक पैसे की बर्बादी करते हैं। जिनके पास पैसा है वो खर्च करे तो उसे उचित मान भी सकते हैं लेकिन लोग कर्ज लेकर खर्च करने को मजबूर होते हैं अपनी प्रतिष्ठा और सामाजिक दबाव के कारण। कहते हैं अमीर अपनी अमीरी को दिखाने के लिए पैसे बर्बाद करता है। इससे गरीब लोगों पर प्रेसर क्रिएट होता है और वो अपनी गरीबी को छिपाने व अपने झूठे स्वाभिमान की रक्षा के लिए मजबूर होकर खर्च करता है जिससे कर्ज के बोझ व गरीबी के कुचक्र में फंसता चला जाता है।
भारत में गरीबी का एक और कारण है बाजार की ब्रांडिंग व्यवस्था। बड़े पूंजीपति लोग पैसे के बल पर अपने उत्पाद की ( चाहे वस्तु हो या सेवा) इस प्रकार से ब्रांडिंग कराते हैं कि उपभोक्ता उनके उत्पादों को खरीदने में गर्व का अनुभव करते हैं। इससे छोटे उत्पादकों के उत्पाद बाजार में प्रतियोगिता नहीं कर पाते जिससे नए लोग उत्पादन के क्षेत्र में आगे आने से हतोत्साहित होते हैं। पापड़ चटनी अचार नमकीन आदि का उत्पादन कोई भी बेरोजगार व्यक्ति छोटी पूंजी मै शुरू कर सकता है लेकिन उसके उत्पाद के बिकने की गारंटी नहीं है इसलिए लोग आगे आने की हिम्मत नहीं कर पाते। हमारी मानसिकता ऐसी है कि सेम प्रोडक्ट ऊंचे दामों में बड़े बड़े मॉल से खरीदना पसंद करते हैं लेकिन छोटे दुकानदारों से कम दाम में भी खरीदने नहीं जाते और जाते भी हैं तो इतनी बार्गेनिंग करते हैं कि दुकानदारों को पर्याप्त लाभ नहीं मिल पाता। ऐसे दुकानदारों की दो वक्त की रोटी भी चलनी मुश्किल होती है। अतः छोटे लोग दुकान भी लगाने की हिम्मत नहीं कर पाते कि क्या पता दुकान चलेगी या नहीं? इस प्रकार हमारी अर्थव्यवस्था का स्वरूप ही ऐसा है कि पूंजी का प्रवाह नीचे से उपर की ओर है।
भारत की गरीबी का एक प्रमुख कारण अशिक्षा भी है।समाज के निम्न वर्ग के लोग अभी भी शायद शिक्षा के महत्व को समझ नहीं पाए हैं।इस दिशा में इतने सरकारी प्रयास हो रहे हैं लेकिन सब बेकार साबित हो रहे हैं।इसके लिए उन्हें पढ़ाने से पहले पढ़ने के लिए तैयार करना होगा।उन्हें कहानियों से अभिप्रेरित करना होगा।पढ़ लिख कर आगे बढ़ने और पैसा कमाने की भूख पैदा करना होगा।
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