आज जब गुटनिरपेक्ष देशों का 18 वां शिखर सम्मेलन अजरबेजान के बाकू में चल रहा है तो बुद्धिजीवियों की उस पर नजर लाजमी है।आइए जानते हैं क्या है भारत की गुटनिरपेक्षता की नीति और वर्तमान में इसकी क्या प्रासंगिकता है।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब पूरा विश्व शीत युद्ध और गुटबंदी के दौर से गुजर रहा था तब नव स्वतंत्र भारत के सम्मुख अपनी स्वतंत्र विदेश नीति स्थाापित करने की चुनौती थी। चूंकि भारत शांति पूर्वक अपना नवनिर्माण व विकास करना चाहता था तथा इसके लिए दोनों ही गुटों से आर्थिक एवं तकनीकी सहायता की आवश्यकता थी इसलिए भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया। यदि किसी एक गुट में शामिल होता तो भारत की स्वतंत्र विदेश नीति प्रभावित होती, जैसा कि नेहरू जी का कहना था कि हम किसी के उपग्रह नहीं बनना चाहते। भारत की शांतिपूर्ण विकास की इच्छा शीत युद्ध की भेट चढ़ जाती तथा आधी दुनिया से शत्रुता मोल लेकर उनसे आर्थिक व तकनीकी सहायता प्राप्त करने से वंचित रह जाते।
लेकिन शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अब ये सवाल प्रायः पूछा जाता है कि क्या भारत को गुटनिरपेक्षता की नीति का त्याग करके अमेरिका की ओर रुख करना चाहिए? शायद मोदी सरकार भी इसी बात पर विचार कर रही है इसलिए पिछले दो शिखर सम्मेलन में माननीय प्रधानमंत्री जी भाग लेने नहीं जा रहे हैं। भारत का प्रतिनिधित्व माननीय उपराष्ट्रपति कर रहे हैं। शायद मोदी सरकार यह भी विश्लेषण कर रही है कि भारत के सबसे बड़े प्रतिद्वंदी चीन का काउंटर पोल अमेरिका है अतः चीन को साधने के लिए अमेरिका से रिश्ते मजबूत करना भारत के लिए ज्यादा उपयुक्त होगा। एक समय था जब अमेरिका भारत के विरूद्ध पाकिस्तान की मदद कर रहा था उस समय भी चीन के मुद्दे पर अमेरिका भारत का साथ दिया था। डोकलाम विवाद के समय भी अमेरिका भारत के साथ था। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि गुट निरपेक्ष आंदोलन गुटबंदी के विरोध में कम अमेरिका के विरोध में ज्यादा प्रखर था। अब जब अमेरिका से हमारे रिश्ते सुधार के दौर में हैं तो ऐसे में NAM का राग अलापना बेमानी होगी।
लेकिन कुछ विशेषज्ञों की राय है कि आज के बदले वैश्विक परिदृश्य में भी NAM की प्रासंगिकता बनी हुई है। इसके पक्ष में कई बिंदु हैं लेकिन तीन महत्वपूर्ण बिंदु निम्न हैं
1- पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को समाप्त करने तथा टेरर फंडिंग पर लगाम लगाने के लिए यह मंच महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
2- जब संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ था उस समय इसमें केवल 51 सदस्य थे, लेकिन आज सदस्यों की संख्या बढ़कर 193 हो गई। अतः इस वैश्विक संस्था का लोकतांत्रिक तरीके से पुनर्गठन होना चाहिए। सुरक्षा परिषद में भारत को स्थाई सदस्यता मिलनी चाहिए। अतः भारत की इस दावेदारी को मजबूत बनाने के लिए भारत की पहचान तीसरी दुनिया के नेतृत्व कर्ता के तौर पर बनी रहनी चाहिए।
3- भारत के लिए नाम इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विकसित देश विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से अपनी नव उपनिवेशवादी नीतियों को विकासशील देशों पर थोपते रहते हैं इसलिए विकसित देशों पर दबाव बनाने के लिए तृतीय विश्व के देशों को एकजुट रहना होगा।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब पूरा विश्व शीत युद्ध और गुटबंदी के दौर से गुजर रहा था तब नव स्वतंत्र भारत के सम्मुख अपनी स्वतंत्र विदेश नीति स्थाापित करने की चुनौती थी। चूंकि भारत शांति पूर्वक अपना नवनिर्माण व विकास करना चाहता था तथा इसके लिए दोनों ही गुटों से आर्थिक एवं तकनीकी सहायता की आवश्यकता थी इसलिए भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति का अनुसरण किया। यदि किसी एक गुट में शामिल होता तो भारत की स्वतंत्र विदेश नीति प्रभावित होती, जैसा कि नेहरू जी का कहना था कि हम किसी के उपग्रह नहीं बनना चाहते। भारत की शांतिपूर्ण विकास की इच्छा शीत युद्ध की भेट चढ़ जाती तथा आधी दुनिया से शत्रुता मोल लेकर उनसे आर्थिक व तकनीकी सहायता प्राप्त करने से वंचित रह जाते।
लेकिन शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अब ये सवाल प्रायः पूछा जाता है कि क्या भारत को गुटनिरपेक्षता की नीति का त्याग करके अमेरिका की ओर रुख करना चाहिए? शायद मोदी सरकार भी इसी बात पर विचार कर रही है इसलिए पिछले दो शिखर सम्मेलन में माननीय प्रधानमंत्री जी भाग लेने नहीं जा रहे हैं। भारत का प्रतिनिधित्व माननीय उपराष्ट्रपति कर रहे हैं। शायद मोदी सरकार यह भी विश्लेषण कर रही है कि भारत के सबसे बड़े प्रतिद्वंदी चीन का काउंटर पोल अमेरिका है अतः चीन को साधने के लिए अमेरिका से रिश्ते मजबूत करना भारत के लिए ज्यादा उपयुक्त होगा। एक समय था जब अमेरिका भारत के विरूद्ध पाकिस्तान की मदद कर रहा था उस समय भी चीन के मुद्दे पर अमेरिका भारत का साथ दिया था। डोकलाम विवाद के समय भी अमेरिका भारत के साथ था। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि गुट निरपेक्ष आंदोलन गुटबंदी के विरोध में कम अमेरिका के विरोध में ज्यादा प्रखर था। अब जब अमेरिका से हमारे रिश्ते सुधार के दौर में हैं तो ऐसे में NAM का राग अलापना बेमानी होगी।
लेकिन कुछ विशेषज्ञों की राय है कि आज के बदले वैश्विक परिदृश्य में भी NAM की प्रासंगिकता बनी हुई है। इसके पक्ष में कई बिंदु हैं लेकिन तीन महत्वपूर्ण बिंदु निम्न हैं
1- पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद को समाप्त करने तथा टेरर फंडिंग पर लगाम लगाने के लिए यह मंच महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
2- जब संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ था उस समय इसमें केवल 51 सदस्य थे, लेकिन आज सदस्यों की संख्या बढ़कर 193 हो गई। अतः इस वैश्विक संस्था का लोकतांत्रिक तरीके से पुनर्गठन होना चाहिए। सुरक्षा परिषद में भारत को स्थाई सदस्यता मिलनी चाहिए। अतः भारत की इस दावेदारी को मजबूत बनाने के लिए भारत की पहचान तीसरी दुनिया के नेतृत्व कर्ता के तौर पर बनी रहनी चाहिए।
3- भारत के लिए नाम इस लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विकसित देश विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से अपनी नव उपनिवेशवादी नीतियों को विकासशील देशों पर थोपते रहते हैं इसलिए विकसित देशों पर दबाव बनाने के लिए तृतीय विश्व के देशों को एकजुट रहना होगा।
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